Wednesday, September 16, 2009

जिदंगी

जिदंगी को ऎसी कलपना समझॊ ,
रात कॊ सच सुबह कॊ सपना समझो ।
भुलाना चाह्ते हो अगर सभी जख्मो को,
तो जिंदगी मे किसी को अपना समझॊ ।

7 comments:

Ram said...

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दिगम्बर नासवा said...

BAHOOT KHOOBSOORAT KHYAL HAI SANJAY JI .......

राकेश जैन said...

sundar baat!

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...
मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग "मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी"में पिरो दिया है।
आप का स्वागत है...

ajay saxena said...

बहुत खूब संजू जी

लता 'हया' said...

shukria.
aapke khayalaat padh kar achha laga;YE HAQIQAT HAI.

vishal said...

लेकिन संजू जी कोई हमें अपना नहीं समझे तो क्या करें?? I am serious on this..