Friday, May 29, 2009

आइये आपको दिखाये कुछ नया

आइये आपको दिखाये कुछ नया ये वीडियो मुझे मेरे दोस्त ने भेजा है मै आप सब को कुछ दिखाना चाहता हू शायद आपको पसंद आये तो अपनी राय से अवगत कराये
video

Monday, May 18, 2009

अहसास की रचनाऐं: बिखरे मोती: समीर लाल- समीक्षा: विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’

पुस्तक समीक्षा

कृति: बिखरे मोती
कवि: समीर लाल ’समीर’
मूल्य: २०० रुपये, १५ US $, पृष्ठ १०४
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सिहोर (म.प्र.)

कवि: समीर लाल ’समीर’

समीर लाल


समीक्षक: विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’
विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’


’अहसास की रचनायें’
समीक्षक: विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’



"मुझको ज्ञान नहीं है बिल्कुल छंदो का,
बस मन में अनुराग लिए फिरता हूँ मैं."


ये पंक्तियाँ हैं, सद्यः प्रकाशित काव्य संकलन ’बिखरे मोती’ में प्रकाशित ’आस लिए फिरता हूँ मैं’ से. समीर लाल जो हिन्दी ब्लॉग जगत में ’उड़न तश्तरी’ नाम से सुविख्यात हैं. एक लब्ध प्रतिष्ठित ब्लॉगर, कवि, विचारक एवं चिंतक हैं. समाज, देश के सारोकार उनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकते हैं. अपनी ७१ रचनाओं, जिनमें गीत, गज़लें, छंद मुक्त कवितायें, मुक्तक एवं क्षणिकायें समाहित हैं, के रुप में उन्होंने अपना पहला काव्य संग्रह ’बिखरे मोती’ हिन्दी पाठकों हेतु पुस्तकाकार प्रस्तुत किया है.

कम्प्यूटर की दुनियां के वर्चुएल जगह की तात्कालिक, समूची दुनियां में पहुँच की सुविधा के बावजूद, प्रकाशित पुस्तकों को पढ़ने का आनन्द एवं महत्व अलग ही है. इस दृष्टि से ’बिखरे मोती’ का प्रकाशन हिन्दी साहित्यजगत हेतु उपलब्धि है.

अपने अहसास को शब्दों का रुप देकर हर रोज नई ब्लॉग पोस्ट लिखने वाले समीर जी जब लिखते हैं:

’कुटिल हुई कौटिल्य नीतियाँ,
राज कर रही हैं विष कन्या’


या फिर

’चल उठा तलवार फिर से
ढ़ूंढ़ फिर से कुछ वजह,
इक इमारत धर्म के ही
नाम ढ़ा दी बेवजह’


तब विदेश में रहते हुये भी समीर का मन भारत की राजनीति, यहाँ धर्म के नाम पर होते दंगों फसादों से अपनी पीड़ा, की आहत अभिव्यक्ति करता लगता है.

वे लिखते हैं:

’लिखता हूँ अब बस लिखने को,
लिखने जैसी बात नहीं है.'


या फिर

’हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
चिड़ियों ने यह जात न पाई.’


या फिर

’नाम जिसका है खुदा, भगवान भी तो है वही,
भेद करते हो भला क्यूँ, इस जरा से नाम से.’


धर्म के पाखण्ड पर यह समीर की सशक्त कलम के सक्षम प्रहार हैं.
इसी तरह आरक्षण की कुत्सित नीति पर वे लिखते नजर आते हैं:

’दलितों का उद्धार जरुरी, कब ये बात नहीं मानी,
आरक्षण की रीति गलत है, इसमें गरज तुम्हारी है’


एक सर्वथा अलग अंदाज में जब वे मन से, अपने आप से बातें करते हैं, वो लिखते हैं:

’आपका नाम बस लिख दिया,
लीजिये शायरी हो गई.’


कुल मिला कर ’बिखरे मोती’ की कई कई मालायें समीर के जेहन में हैं. उनकी रचनाओं का हर मोती एक दूसरे से बढ़ कर है. प्रत्येक अपने आप में परिपूर्ण, अपनी ही चमक लिये, अपना ही संदेशा लिये, अद्भुत!

सारी रचनायें समग्र रुप से कहें तो अहसास की रचनायें हैं, जिन्हें संप्रेषणीयता के उन्मान पर पहुँच कर समीर ने सार्वजनिक कर हम सब से बांटा है.

पुस्तक पठनीय, पुनर्पठनीय एवं संग्रहणीय है.

बधाई एवं शुभकामनाऐं.
- विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’
जबलपुर, म.प्र.
ब्लॉग: http://vivekkevyang.blogspot.com/

Sunday, May 17, 2009

जाने क्यूँ!!!



जाने क्यूँ खोया खोया रहता हूँ...
लबों पर हँसी, दिल से रोता हूँ.

Tuesday, May 12, 2009

आपकी जरूरत...



१.
रोज हम नशे मे होते है,
और रात गुजर जाती है..
एक दिन रात नशे मे होगी ,
और हम गुजर जायेगे,
शायद तभी हम आपको याद आयेगे ..
२.
आपकी कमी अब महसूस होने लगी है ,
आपकी यादो से आंख नम होने लगी है ,
हमेशा मेरे दिल मे रहते है आप लेकिन,
आपकी जरूरत अब धड़कनो को भी होने लगी है..