Monday, May 18, 2009

अहसास की रचनाऐं: बिखरे मोती: समीर लाल- समीक्षा: विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’

पुस्तक समीक्षा

कृति: बिखरे मोती
कवि: समीर लाल ’समीर’
मूल्य: २०० रुपये, १५ US $, पृष्ठ १०४
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सिहोर (म.प्र.)

कवि: समीर लाल ’समीर’

समीर लाल


समीक्षक: विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’
विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’


’अहसास की रचनायें’
समीक्षक: विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’



"मुझको ज्ञान नहीं है बिल्कुल छंदो का,
बस मन में अनुराग लिए फिरता हूँ मैं."


ये पंक्तियाँ हैं, सद्यः प्रकाशित काव्य संकलन ’बिखरे मोती’ में प्रकाशित ’आस लिए फिरता हूँ मैं’ से. समीर लाल जो हिन्दी ब्लॉग जगत में ’उड़न तश्तरी’ नाम से सुविख्यात हैं. एक लब्ध प्रतिष्ठित ब्लॉगर, कवि, विचारक एवं चिंतक हैं. समाज, देश के सारोकार उनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकते हैं. अपनी ७१ रचनाओं, जिनमें गीत, गज़लें, छंद मुक्त कवितायें, मुक्तक एवं क्षणिकायें समाहित हैं, के रुप में उन्होंने अपना पहला काव्य संग्रह ’बिखरे मोती’ हिन्दी पाठकों हेतु पुस्तकाकार प्रस्तुत किया है.

कम्प्यूटर की दुनियां के वर्चुएल जगह की तात्कालिक, समूची दुनियां में पहुँच की सुविधा के बावजूद, प्रकाशित पुस्तकों को पढ़ने का आनन्द एवं महत्व अलग ही है. इस दृष्टि से ’बिखरे मोती’ का प्रकाशन हिन्दी साहित्यजगत हेतु उपलब्धि है.

अपने अहसास को शब्दों का रुप देकर हर रोज नई ब्लॉग पोस्ट लिखने वाले समीर जी जब लिखते हैं:

’कुटिल हुई कौटिल्य नीतियाँ,
राज कर रही हैं विष कन्या’


या फिर

’चल उठा तलवार फिर से
ढ़ूंढ़ फिर से कुछ वजह,
इक इमारत धर्म के ही
नाम ढ़ा दी बेवजह’


तब विदेश में रहते हुये भी समीर का मन भारत की राजनीति, यहाँ धर्म के नाम पर होते दंगों फसादों से अपनी पीड़ा, की आहत अभिव्यक्ति करता लगता है.

वे लिखते हैं:

’लिखता हूँ अब बस लिखने को,
लिखने जैसी बात नहीं है.'


या फिर

’हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
चिड़ियों ने यह जात न पाई.’


या फिर

’नाम जिसका है खुदा, भगवान भी तो है वही,
भेद करते हो भला क्यूँ, इस जरा से नाम से.’


धर्म के पाखण्ड पर यह समीर की सशक्त कलम के सक्षम प्रहार हैं.
इसी तरह आरक्षण की कुत्सित नीति पर वे लिखते नजर आते हैं:

’दलितों का उद्धार जरुरी, कब ये बात नहीं मानी,
आरक्षण की रीति गलत है, इसमें गरज तुम्हारी है’


एक सर्वथा अलग अंदाज में जब वे मन से, अपने आप से बातें करते हैं, वो लिखते हैं:

’आपका नाम बस लिख दिया,
लीजिये शायरी हो गई.’


कुल मिला कर ’बिखरे मोती’ की कई कई मालायें समीर के जेहन में हैं. उनकी रचनाओं का हर मोती एक दूसरे से बढ़ कर है. प्रत्येक अपने आप में परिपूर्ण, अपनी ही चमक लिये, अपना ही संदेशा लिये, अद्भुत!

सारी रचनायें समग्र रुप से कहें तो अहसास की रचनायें हैं, जिन्हें संप्रेषणीयता के उन्मान पर पहुँच कर समीर ने सार्वजनिक कर हम सब से बांटा है.

पुस्तक पठनीय, पुनर्पठनीय एवं संग्रहणीय है.

बधाई एवं शुभकामनाऐं.
- विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’
जबलपुर, म.प्र.
ब्लॉग: http://vivekkevyang.blogspot.com/

Sunday, May 17, 2009

जाने क्यूँ!!!



जाने क्यूँ खोया खोया रहता हूँ...
लबों पर हँसी, दिल से रोता हूँ.

Tuesday, May 12, 2009

आपकी जरूरत...



१.
रोज हम नशे मे होते है,
और रात गुजर जाती है..
एक दिन रात नशे मे होगी ,
और हम गुजर जायेगे,
शायद तभी हम आपको याद आयेगे ..
२.
आपकी कमी अब महसूस होने लगी है ,
आपकी यादो से आंख नम होने लगी है ,
हमेशा मेरे दिल मे रहते है आप लेकिन,
आपकी जरूरत अब धड़कनो को भी होने लगी है..

Wednesday, April 29, 2009

आपकी खातिर कुछ....




जिन्दगी यूँ गुजर जायेगी आहिस्ता आहिस्ता,
घड़ी भी पाबंदी लगायेगी आहिस्ता आहिस्ता,
बेशक, तुम मुझे याद रखोगी कुछ दिन तलक,
फिर भूल भी मुझे जाओगी आहिस्ता आहिस्ता.

*~*~*~*~*


वो नाराज होता है कि कुछ लिखते नहीं ,
कहाँ से लायें वो लफ्ज जो मिलते नहीं ,
दर्द की गर जुबां होती तो बता देते उनसे,
वो जख्म कैसे दिखा दें जो दिखते नहीं.

-संजय तिवारी ’संजू’

Monday, April 27, 2009

अजब गजब तेरी माया..




वाह प्रभु!! ये कैसी तेरी लीला?
चूहा बिल्ली से डरता है ,
बिल्ली कुत्ते से डरती है ,
कुत्ता आदमी से डरता है,
आदमी बीबी से डरता है,
ओर बीबी चूहे से....

वाह रे चूहे!!
तू ही है महान....
हम तेरे सामने
प्राणी हैं नादान!!!

Wednesday, April 22, 2009

यूँ ही बिखरा बिखरा सा वजूद है मेरा!!!



किताबों के पन्नों को पलट के सोचता हूँ,
यूँजिन्दगी भी पलट जाये तो क्या बात है.

ख्वाबों में तो हरदम मिलता ही है वो,
आ हकीकत में लिपट जाये तो क्या बात है.

कुछ मतलब लिए ढ़ूँढ़ते हैं सब मुझको ,
आ बेमतलब निकट जाये तो क्या बात है.

यूँ ही बिखरा बिखरा सा वजूद है मेरा ,
बातों से तेरी सिमट जाये तो क्या बात है.

छीन कर तो सब ले जायेंगे दिल मेरा ,
तेरी अदा पे रपट जाये तो क्या बात है.

था मौज में झूमता वो शराबी चला,
वो हकीकत में घट जाये तो क्या बात है.

जो शरीफों की संगत में ना काटे कटे
रात संग सुरा के कट जाये तो क्या बात है.

हर कदम पर मैं खुशियाँ लुटाता चलूँ ,
यूँ ही जिन्दगी निपट जाये तो क्या बात है.

Thursday, April 16, 2009

तुम गये कुछ दूर

तुम गये कुछ दूर मुझसे,मन उदास सा हो गया ,
याद आना दिल दुखाना,कितना खास सा हो गया ,
हा सुनता रोज था,चला जाऊँगा मै फिर एक दिन,
यूँ छोड़ कर तेरा जाना, अनायास सा हो गया ,
आने को जाते, तो बहला लेते हमीं खुद को
मझ लेते अब समीर इक आस सा हो गया.
ताकता आसूं बहाता मैं रह पाऊँगा कब तलक,
नाम तेरा जब भी आया, बदहवास सा हो गया.