Showing posts with label विवेक रंजन श्रीवास्तव. Show all posts
Showing posts with label विवेक रंजन श्रीवास्तव. Show all posts

Saturday, February 12, 2011

समीर लाल का जीवन भी किसी उपन्यास से कम नहीं: ’ देख लूँ तो चलूँ ’: विवेक रंजन श्रीवास्तव




संस्मरण: ’ देख लूँ तो चलूँ ’
लेखक : समीर लाल
मूल्य : 100 रू.
पृष्ठ:  88
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, पी. सी. लैब, सम्राट काम्पलेक्स बेसमेंट, बस स्टेंड, सीहोर (म.प्र.) ४६६००१
समीक्षक:विवेक रंजन श्रीवास्तव, ओ.बी. 11, विद्युत मंडल कालोनी, जबलपुर 

एक ऐसा संस्मरण जो कहीं कहीं ट्रेवेलाग है, कहीं डायरी के पृष्ठ, कहीं कविता और कहीं उसमें कहानी के तत्व है। कहीं वह एक शिक्षाप्रद लेख है, दरअसल समीर लाल की नई कृति ‘‘देख लूँ तो चलूँ‘‘ उपन्यासिका टाइप का संस्मरण है। समीर लाल  हिन्दी ब्लाग जगत के पुराने,  सुपरिचित और लोकप्रिय लेखक व हर ब्लाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले चर्चित टिप्पणीकार है। उनका स्वंय का जीवन भी किसी उपन्यास से कम नहीं है।

 ‘‘जब वी मेट‘‘ के रतलाम से शुरू उनका सफर सारी दुनियाँ के ढेरो चक्कर लगाता हुआ निरंतर जारी है। उनकी हृष्ट पुष्ट कद काठी के भीतर एक अत्यंत संवेदनशील मन है और दुनियादारी को समझने वाली कुशाग्रता भी उनमें कूट-कूट कर भरी हुई है। अपने मनोभावों को पाठक तक चित्रमय प्रस्तुत कर सकने की क्षमता वाली भाषाई कुशलता भी उनमें है। इस सबका ही परिणाम है कि जब मैं उनकी नई पुस्तक ‘‘देख लूँ तो चलूँ‘‘ पढने बैठा तो बस ’पढ़ लूँ तो उठूँ’ वाली शैली में पूरा ही पढ गया। 

इस संस्मरण में प्रवासी भारतीयों का अपनी धरती से जुडाव वर्णित है। दरअसल हमारी संस्कृति में अपनेपन और लगाव की शिक्षा बचपन से ही हमारे संस्कारों से हमें मिलती है। रिश्तों, धरती और घर की यादों का जुडाव तो बहुत बड़ी बात है, हमारा बस चले तो हम डॉट पेन की रिफिल में भी स्याही भरकर उसे अपने से जुदा न होने दें। इसके बिल्कुल विपरीत जब पाश्चात्य यूज एडं थ्रो की संस्कृति से हम भारतीयों को दो चार होना पड़ता है तो जो मनोभाव उत्पन्न होते है उनकी अभिव्यक्ति के शब्दचित्र इस संस्मरणिका में देखने को मिलते है।

अनेक स्थलों पर समीर बहुत कम शब्दो में बहुत बड़े संदेश दे गये है, जैसे ‘‘कभी रख कर देखा है उनके जूते में अपना पैर‘‘ संवेदना का इससे बड़ा और क्या अनुभव कोई कर सकता है। वे लिखते है ‘‘ सुविधायें बहुत तेजी से आदत खराब करती है‘‘ यह एक शाष्वत तथ्य है। इन्हीं सुविधाओं की गुलामी के चलते चाह कर भी अनेक प्रवासी भारतीय स्वदेश वापस ही नहीं लौट पाते ।

इसी कृति में समीर लिखते है कि ‘‘अम्मा कहती थीं हमेशा सम्भल कर बोलना चाहिए‘‘, ‘‘यही होता है दिल के भीतर भगवान बैठा है और उसी को ढूंढने मंदिर-मंदिर तीरथ-तीरथ भटक रहे है‘‘, ‘‘व्यवहार बिना सूद का कर्जा है‘‘,  ‘‘ चोरी कैसी भी अपराधबोध पैकेज डील की तरह साथ आता ही है‘‘ ।

उनकी यह कृति अप्रवासी भारतीयों के किसी भारतीय सम्मेलन में सभी आमंत्रितों को भेंट किये जाने हेतु सर्वथा उपयुक्त है , क्योकि इन कथानको में हर वह भारतीय कही न कही स्वयं को उपस्थित पायेगा जिसकी जड़ें तो भारत में हैं पर वह विदेशो में फल फूल रहा है । 




ओ.बी. 11, विद्युत मंडल कालोनी, 
जबलपुर 
vivek ranjan shrivastava


Monday, May 18, 2009

अहसास की रचनाऐं: बिखरे मोती: समीर लाल- समीक्षा: विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’

पुस्तक समीक्षा

कृति: बिखरे मोती
कवि: समीर लाल ’समीर’
मूल्य: २०० रुपये, १५ US $, पृष्ठ १०४
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सिहोर (म.प्र.)

कवि: समीर लाल ’समीर’

समीर लाल


समीक्षक: विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’
विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’


’अहसास की रचनायें’
समीक्षक: विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’



"मुझको ज्ञान नहीं है बिल्कुल छंदो का,
बस मन में अनुराग लिए फिरता हूँ मैं."


ये पंक्तियाँ हैं, सद्यः प्रकाशित काव्य संकलन ’बिखरे मोती’ में प्रकाशित ’आस लिए फिरता हूँ मैं’ से. समीर लाल जो हिन्दी ब्लॉग जगत में ’उड़न तश्तरी’ नाम से सुविख्यात हैं. एक लब्ध प्रतिष्ठित ब्लॉगर, कवि, विचारक एवं चिंतक हैं. समाज, देश के सारोकार उनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकते हैं. अपनी ७१ रचनाओं, जिनमें गीत, गज़लें, छंद मुक्त कवितायें, मुक्तक एवं क्षणिकायें समाहित हैं, के रुप में उन्होंने अपना पहला काव्य संग्रह ’बिखरे मोती’ हिन्दी पाठकों हेतु पुस्तकाकार प्रस्तुत किया है.

कम्प्यूटर की दुनियां के वर्चुएल जगह की तात्कालिक, समूची दुनियां में पहुँच की सुविधा के बावजूद, प्रकाशित पुस्तकों को पढ़ने का आनन्द एवं महत्व अलग ही है. इस दृष्टि से ’बिखरे मोती’ का प्रकाशन हिन्दी साहित्यजगत हेतु उपलब्धि है.

अपने अहसास को शब्दों का रुप देकर हर रोज नई ब्लॉग पोस्ट लिखने वाले समीर जी जब लिखते हैं:

’कुटिल हुई कौटिल्य नीतियाँ,
राज कर रही हैं विष कन्या’


या फिर

’चल उठा तलवार फिर से
ढ़ूंढ़ फिर से कुछ वजह,
इक इमारत धर्म के ही
नाम ढ़ा दी बेवजह’


तब विदेश में रहते हुये भी समीर का मन भारत की राजनीति, यहाँ धर्म के नाम पर होते दंगों फसादों से अपनी पीड़ा, की आहत अभिव्यक्ति करता लगता है.

वे लिखते हैं:

’लिखता हूँ अब बस लिखने को,
लिखने जैसी बात नहीं है.'


या फिर

’हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
चिड़ियों ने यह जात न पाई.’


या फिर

’नाम जिसका है खुदा, भगवान भी तो है वही,
भेद करते हो भला क्यूँ, इस जरा से नाम से.’


धर्म के पाखण्ड पर यह समीर की सशक्त कलम के सक्षम प्रहार हैं.
इसी तरह आरक्षण की कुत्सित नीति पर वे लिखते नजर आते हैं:

’दलितों का उद्धार जरुरी, कब ये बात नहीं मानी,
आरक्षण की रीति गलत है, इसमें गरज तुम्हारी है’


एक सर्वथा अलग अंदाज में जब वे मन से, अपने आप से बातें करते हैं, वो लिखते हैं:

’आपका नाम बस लिख दिया,
लीजिये शायरी हो गई.’


कुल मिला कर ’बिखरे मोती’ की कई कई मालायें समीर के जेहन में हैं. उनकी रचनाओं का हर मोती एक दूसरे से बढ़ कर है. प्रत्येक अपने आप में परिपूर्ण, अपनी ही चमक लिये, अपना ही संदेशा लिये, अद्भुत!

सारी रचनायें समग्र रुप से कहें तो अहसास की रचनायें हैं, जिन्हें संप्रेषणीयता के उन्मान पर पहुँच कर समीर ने सार्वजनिक कर हम सब से बांटा है.

पुस्तक पठनीय, पुनर्पठनीय एवं संग्रहणीय है.

बधाई एवं शुभकामनाऐं.
- विवेक रंजन श्रीवास्तव ’विनम्र’
जबलपुर, म.प्र.
ब्लॉग: http://vivekkevyang.blogspot.com/