संस्मरण: ’ देख लूँ तो चलूँ ’
लेखक : समीर लाल
मूल्य : 100 रू.
पृष्ठ: 88
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, पी. सी. लैब, सम्राट काम्पलेक्स बेसमेंट, बस स्टेंड, सीहोर (म.प्र.) ४६६००१
समीक्षक:विवेक रंजन श्रीवास्तव, ओ.बी. 11, विद्युत मंडल कालोनी, जबलपुर
एक ऐसा संस्मरण जो कहीं कहीं ट्रेवेलाग है, कहीं डायरी के पृष्ठ, कहीं कविता और कहीं उसमें कहानी के तत्व है। कहीं वह एक शिक्षाप्रद लेख है, दरअसल समीर लाल की नई कृति ‘‘देख लूँ तो चलूँ‘‘ उपन्यासिका टाइप का संस्मरण है। समीर लाल हिन्दी ब्लाग जगत के पुराने, सुपरिचित और लोकप्रिय लेखक व हर ब्लाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले चर्चित टिप्पणीकार है। उनका स्वंय का जीवन भी किसी उपन्यास से कम नहीं है।
‘‘जब वी मेट‘‘ के रतलाम से शुरू उनका सफर सारी दुनियाँ के ढेरो चक्कर लगाता हुआ निरंतर जारी है। उनकी हृष्ट पुष्ट कद काठी के भीतर एक अत्यंत संवेदनशील मन है और दुनियादारी को समझने वाली कुशाग्रता भी उनमें कूट-कूट कर भरी हुई है। अपने मनोभावों को पाठक तक चित्रमय प्रस्तुत कर सकने की क्षमता वाली भाषाई कुशलता भी उनमें है। इस सबका ही परिणाम है कि जब मैं उनकी नई पुस्तक ‘‘देख लूँ तो चलूँ‘‘ पढने बैठा तो बस ’पढ़ लूँ तो उठूँ’ वाली शैली में पूरा ही पढ गया।
इस संस्मरण में प्रवासी भारतीयों का अपनी धरती से जुडाव वर्णित है। दरअसल हमारी संस्कृति में अपनेपन और लगाव की शिक्षा बचपन से ही हमारे संस्कारों से हमें मिलती है। रिश्तों, धरती और घर की यादों का जुडाव तो बहुत बड़ी बात है, हमारा बस चले तो हम डॉट पेन की रिफिल में भी स्याही भरकर उसे अपने से जुदा न होने दें। इसके बिल्कुल विपरीत जब पाश्चात्य यूज एडं थ्रो की संस्कृति से हम भारतीयों को दो चार होना पड़ता है तो जो मनोभाव उत्पन्न होते है उनकी अभिव्यक्ति के शब्दचित्र इस संस्मरणिका में देखने को मिलते है।
अनेक स्थलों पर समीर बहुत कम शब्दो में बहुत बड़े संदेश दे गये है, जैसे ‘‘कभी रख कर देखा है उनके जूते में अपना पैर‘‘ संवेदना का इससे बड़ा और क्या अनुभव कोई कर सकता है। वे लिखते है ‘‘ सुविधायें बहुत तेजी से आदत खराब करती है‘‘ यह एक शाष्वत तथ्य है। इन्हीं सुविधाओं की गुलामी के चलते चाह कर भी अनेक प्रवासी भारतीय स्वदेश वापस ही नहीं लौट पाते ।
इसी कृति में समीर लिखते है कि ‘‘अम्मा कहती थीं हमेशा सम्भल कर बोलना चाहिए‘‘, ‘‘यही होता है दिल के भीतर भगवान बैठा है और उसी को ढूंढने मंदिर-मंदिर तीरथ-तीरथ भटक रहे है‘‘, ‘‘व्यवहार बिना सूद का कर्जा है‘‘, ‘‘ चोरी कैसी भी अपराधबोध पैकेज डील की तरह साथ आता ही है‘‘ ।
उनकी यह कृति अप्रवासी भारतीयों के किसी भारतीय सम्मेलन में सभी आमंत्रितों को भेंट किये जाने हेतु सर्वथा उपयुक्त है , क्योकि इन कथानको में हर वह भारतीय कही न कही स्वयं को उपस्थित पायेगा जिसकी जड़ें तो भारत में हैं पर वह विदेशो में फल फूल रहा है ।
ओ.बी. 11, विद्युत मंडल कालोनी,
जबलपुर
vivek ranjan shrivastava








5 comments:
धन्यवाद, संजू!!
हमें भी इंतजार है, फ़िर हम भी पढ़ते हैं।
जै हो संजू बाबा
भाई जी
ऐसा डॉन टाइप माहौल खीचोगे तो किताब कौन खरीदेगा और पढ़ेगा, हाँ मुफ्त बाटना है तो कोई बात नहीं
मेरा संदेश उस ब्लॉग के बारे में है जहां यह संदेश है, मूल रूपसे
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