Sunday, May 17, 2009

जाने क्यूँ!!!



जाने क्यूँ खोया खोया रहता हूँ...
लबों पर हँसी, दिल से रोता हूँ.

5 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

भाई मेरे ये तो हकीमों के लिये तो लाइलाज है. नकली लबादा उतार फ़ेंकों, फ़िर देखो क्या मस्ती चढती है उस परमात्मा की.

रामराम.

Udan Tashtari said...

एक बार या तो खुल कर रो ही लो या हँस ही लो!!! :)

वैसे पंक्तियाँ लाजबाब हैं, शायर साहेब!!

राजेश स्वार्थी said...

आप अच्छा लिख लेते हैं.

रामकृष्ण गौतम said...

Ek baar Dil se bhi hansne ki koshish kijie sir!

vishal said...

कलयुग के हिसाब से ठीक हैं साब! हाथी के दाँतों की तरह आदमी ही आज चलता है।