मोह्ब्बत को मजबूरी का नाम मत देना ।
हकीकत कॊ हाद्सॊ का नाम मत देना ।
अगर दिल मे प्यार हॊ किसी के लिये ,
तो उसे दोस्ती का नाम मत देना ।
Monday, November 30, 2009
Wednesday, November 18, 2009
समीर लाल जी ने चिट्ठी भेजी है...
समीर लाल जी, आप सब के उड़न तश्तरी और हमारे जबलपुरियों के चाचा. आज बहुत बार खत लिखने के बाद बस एक कविता से जबाब दे गये.
मैं तो समीर चाचा के साथ बचपन से रहा हूँ हमेशा. फिर चाहे वो उनका दफ्तर रहा हो, राजनितिक मंच या पारिवारिक काम, मैं हमेशा साथ रहा. उनका खास स्नेह मुझ पर हमेशा रहा. वो जब भी कहीं जाते, मैं उनके बाजू में जरुर रहता चाहे जबलपुर में या जबलपुर के बाहर भोपाल, दिल्ली या मुम्बई.

समीर लाल जी
भारत छोड़ने के बाद भी वो जब भी यहाँ आते हैं, जबलपुर में मैं उनके साथ हमेशा रहता हूँ. लेकिन आजकल वो जाने किन कार्यों को निष्पादित करने में लगे हैं, मेरी समझ के बाहर है. वैसे भी उनको बोलते सुनना या पढ़ना, इतनी करीबी के बाद भी, हर बार नया समीर लाल दिखा जाता है. लगता है कि चाचा को अभी जाना ही कितना है.
जब लगातार उनको ईमेल भेजे और फोन करके उनकी प्यार और स्नेह भरी फटकार सुनने के बाद भी मैं लगा रहा कि चाचा, ईमेल तो कर दिया करो तो आज उनका यह ईमेल आया है. क्या जबाब दूँ, समझ नहीं पा रहा था इसलिए आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ, आप ही कुछ बताईये. वो ही लिख देंगे उनको.
समीर चाचा ने यह लिखा है:(छापने के लिए उनसे पूछा नहीं हैं, ज्यादा से ज्यादा प्रसाद में डांटेंगे, और क्या!)
तेजी से भागता
यह उग्र समय...
थोड़ा सा बचा..
और
बच रहा
काम कितना सारा...
सोचता हूँ
जमाने के साथ मिल जाऊँ
उसके साथ कदमताल मिलाऊँ...
ईमान तोड़ूँ अपना
या फिर
काम छोड़ूँ अपना!
कैसा है
यह द्वन्द!!
न जाने क्यूँ
बिखरा हुआ है
यह छंद!!
तुम कुछ बताओ न!!
-समीर लाल ’समीर’
मैं तो समीर चाचा के साथ बचपन से रहा हूँ हमेशा. फिर चाहे वो उनका दफ्तर रहा हो, राजनितिक मंच या पारिवारिक काम, मैं हमेशा साथ रहा. उनका खास स्नेह मुझ पर हमेशा रहा. वो जब भी कहीं जाते, मैं उनके बाजू में जरुर रहता चाहे जबलपुर में या जबलपुर के बाहर भोपाल, दिल्ली या मुम्बई.

भारत छोड़ने के बाद भी वो जब भी यहाँ आते हैं, जबलपुर में मैं उनके साथ हमेशा रहता हूँ. लेकिन आजकल वो जाने किन कार्यों को निष्पादित करने में लगे हैं, मेरी समझ के बाहर है. वैसे भी उनको बोलते सुनना या पढ़ना, इतनी करीबी के बाद भी, हर बार नया समीर लाल दिखा जाता है. लगता है कि चाचा को अभी जाना ही कितना है.
जब लगातार उनको ईमेल भेजे और फोन करके उनकी प्यार और स्नेह भरी फटकार सुनने के बाद भी मैं लगा रहा कि चाचा, ईमेल तो कर दिया करो तो आज उनका यह ईमेल आया है. क्या जबाब दूँ, समझ नहीं पा रहा था इसलिए आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ, आप ही कुछ बताईये. वो ही लिख देंगे उनको.
समीर चाचा ने यह लिखा है:(छापने के लिए उनसे पूछा नहीं हैं, ज्यादा से ज्यादा प्रसाद में डांटेंगे, और क्या!)
तेजी से भागता
यह उग्र समय...
थोड़ा सा बचा..
और
बच रहा
काम कितना सारा...
सोचता हूँ
जमाने के साथ मिल जाऊँ
उसके साथ कदमताल मिलाऊँ...
ईमान तोड़ूँ अपना
या फिर
काम छोड़ूँ अपना!
कैसा है
यह द्वन्द!!
न जाने क्यूँ
बिखरा हुआ है
यह छंद!!
तुम कुछ बताओ न!!
-समीर लाल ’समीर’
Friday, October 23, 2009
हकीकत मे जीना आदत बन जाती है .
हकीकत मे जीना आदत बन जाती है .
खवाब कि दुनिया बेरंग नजर आती है ।
कोई इंतजार करता है जिन्दगी के लिये,
और किसी की जिन्दगी इंतजार मे गुजर जाती है ।
खवाब कि दुनिया बेरंग नजर आती है ।
कोई इंतजार करता है जिन्दगी के लिये,
और किसी की जिन्दगी इंतजार मे गुजर जाती है ।
Tuesday, September 22, 2009
लम्बी उडान
लम्बी उडान से अपने घोसले मे लौटी'
चिडिया से उसके बच्चो ने पूछा मां ’
आस्मान कितना बडा है ?
चिडिया ने बच्चो को पंखों मे समेटे’
हुए कहा सो जाओ मेरे बच्चो वो,
मेरे पंखॊ से छॊटा है ।
IT IS REALITY NOTHING IN
UNIVERSE IS BIGGER THAN
d SHELTER OF A MOTHER`S LEP........
चिडिया से उसके बच्चो ने पूछा मां ’
आस्मान कितना बडा है ?
चिडिया ने बच्चो को पंखों मे समेटे’
हुए कहा सो जाओ मेरे बच्चो वो,
मेरे पंखॊ से छॊटा है ।
IT IS REALITY NOTHING IN
UNIVERSE IS BIGGER THAN
d SHELTER OF A MOTHER`S LEP........
Wednesday, September 16, 2009
जिदंगी
जिदंगी को ऎसी कलपना समझॊ ,
रात कॊ सच सुबह कॊ सपना समझो ।
भुलाना चाह्ते हो अगर सभी जख्मो को,
तो जिंदगी मे किसी को अपना समझॊ ।
रात कॊ सच सुबह कॊ सपना समझो ।
भुलाना चाह्ते हो अगर सभी जख्मो को,
तो जिंदगी मे किसी को अपना समझॊ ।
Tuesday, September 15, 2009
कितना मुश्किल है,
दिल के र्दर्द को छुपाना कितना मुश्किल है,
टूट कर फिर मुस्कराना कितना मुश्किल है ।
किसी के साथ दूर तक जाओ ,फिर अकेले आना कितना मुश्किल है
टूट कर फिर मुस्कराना कितना मुश्किल है ।
किसी के साथ दूर तक जाओ ,फिर अकेले आना कितना मुश्किल है
Monday, September 14, 2009
उस अजनबी क यू ना इंतजार करो
उस अजनबी क यू ना इंतजार करो,
इस आशिक दिल का ना एतबार करॊ ।
रोज निकला करे किसी की याद में आसूं ,
इतना कभी किसी से प्यार ना करॊ ।
इस आशिक दिल का ना एतबार करॊ ।
रोज निकला करे किसी की याद में आसूं ,
इतना कभी किसी से प्यार ना करॊ ।
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सदगुरु श्री सांईनाथ
मेरे बारे में..
- संजय तिवारी
- सपनों की दुनिया को साकार रुप देने में व्यस्त-मस्त. बस, और कुछ खास नहीं. एक आम आदमी.



